There's an amazing book called "Bhaja Govindam" by Adi Shankaracharya. In one of a study sessions conducted at Chinmaya Mission, I was asked to speak about the 8th Shloka form the 30 shlokas of the book. It was an amazing session and I got to learn a lot while preparing for the session. I would like to post my script here:
इससे पहले कि मैं आदि शंकराचार्य कृत 'भज गोविन्दम' के 8वे श्लोका का उच्चारण व विश्लेषण करूँ, मैं यह कहना चाहती हूँ कि यह श्लोका detachment पर रौशनी डालता है। Detachment का मतलब है अपनी ज़िन्दगी से स्वार्थपरता और अपेक्षाओं को दूर करना| It is the removal of the feelings of selfishness, demands and expectations. To elaborate on this, I'll narrate a small excerpt from an article written by Sudha Murthy. मैं यह कथन उन्ही के perspective से कहूँगी।
"मैं सुधा मूर्ति हूँ और मेरे दो बच्चे हैं. मेरी बेटी बड़ी है और क्यूंकि वो मेरी पहली संतान है, मेरा जुड़ाव उससे कुछ अधिक था। एक बेटी और एक बेटे की माँ होने के नाते मैं जानती थी कि उनके अपने-अपने अस्तित्व का क्या महत्व था। इसलिए जब मेरी शादी के बाद मेरा घर छोड़ कर गयी, तो मुझे लगा मेरे तन से एक अंग काट गया है। मैं उसे काफी miss करने लगी। पर शादी के बाद जब वह पहली बार आई, तो मैं यह देख कर आश्चर्यचकित रह गयी कि उसकी प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं। अब जब वह अम्मा कहती, उसका मतलब उसकी mother-in-law होता, मैं नहीं। मेरे साथ कुछ समय बिताकर उसे भागने की जल्दी होती। तब मैंने यह निर्णय लिया कि यही वो समय है कि practice detachment with attachment. उसकी शादी के दो साल बाद मेरा बेटा उच्च अध्ययन के लिया अमरीका चला गया। चूँकि मैं एक बच्चे का पृथकरण अनुभव कर चुकी थी, मैं मानसिक रूप से ज्यादा सशक्त थी, ज्यादा मजबूत थी। उस समय मैंने अपने आप को various courses के लिए register किया। From Vedanta to Ike-bana, from healing to yoga, I learnt everything. And since my husband was a 24/7 workaholic, it was all the more necessary for my survival, my happiness and for maintaining peace. समय बीता और बेटा USA से पढ़कर आ गया और हमने उसकी शादी करदी। उसने अलग घर बसाने का निर्णय लिया और अब हम उसके इस निर्णय से काफी खुश थे। पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, हालात भी बदलते गये। USA में मेरे हाथ का खाना miss करने वाले मेरे बेटे के पास एक ही शहर में भी आने का समय नहीं था। उसकी भी प्राथमिकताएं बदल चुकी थी।
दोस्तों, हम इतना ज्ञान बांटते है पर बात जब अपने ऊपर और अपने बच्चों पर आती है, तो मन जैसे मानने को तैयार ही नहीं होता। पर अपनी ख़ुशी अपने हाथ में ही होती है। जब हम अपने रिश्तो या चीज़ो अत्यधिक मोह कर लेते है, असुरक्षा की अनुभूति काफी प्रबलता से होती है। तो मैंने समझा, प्यार सबसे करो पर मोह मत होने दो। Addiction दुःख देता है, प्यार शक्ति देता है। इसलिए तब मैंने तब मैंने अपनी एक नयी profile तैयार की। अब काम मैं सबके लिए पुरे तन-मन से करती, पर किसी से कोई अपेक्षा नहीं करती थी। I became detached in the sense that I did not expect anyone to reciprocate to my affection. Friends, if you let go of the ones you love, they will never go away. My children also started visiting me more often and I loved this. यही सुंदरता है detachment की। "
अब हम आते हैं अपने श्लोका पर-
का ते कान्ता कस्ते पुत्र
संसारो अयम तीव विचित्र
कस्य त्यम का कुत आयात
सत्तत्वं चिन्तय तदहि भ्राता
शंकराचार्य जी कहते हैं कि कौन तुम्हारा साथी है और कौन संतान? यह संसार बहुत विचित्र है। जब तक तुम्हारा देह है, यह सब रिश्ते हैं। तुम अकेले आये हो और अकेले ही जाओगे तो अपने कर्मों का पालन करो क्यूंकि केवल तुम्हारे कर्म ही तुम्हारे संग जायेंगे। कांता को हम विस्तार से बताएं तो इसका मतलब हमारा साथी है- वह हमारा जीवन-साथी हो सकता है, business partner हो सकता है या team mate भी हो सकता है। Partner is someone we look upto for comfort. Child is someone who looks upto us for support. यह सब क्यों हैं, हमने कभी इस पर चिंतन नहीं किया, पर अब समय है इस तथ्य पर रौशनी डालने का।
Shankracharya says we should maintain a dispossess attitude towards our possessions even while we have them and are enjoying them. लोग उनके इस तथ्य का गलत मतलब निकल लेते हैं और रिश्तों और वस्तुओं का त्याग कर देते हैं . NO.......Attachments need to go; not the objects of attachments. Problem is with our attitude, not with people or things. अगर हम सबको analyze करें तो हम देखेंगे कि जो भी हमारे साथ जुड़े हुए हैं- they are individuals with their own distinct personalities, life-goals and aspirations. We don't have much right to interfere with this pattern and impose our will on them. पर फिर भी हम करते हैं और खुद भी दुखी होतें है और सामने वाले को भी ठेस पहुंचाते हैं। दोष हम देते हैं परिस्थितियों को और कभी-कभी ईश्वर को भी। Accept them for what they are, not what you hope to receive from them. Then you see, how wonderful your life becomes.
Same lies with objects. चीज़ों का प्रयोग moderately करना है, उनके अधीन नहीं हो जाना है. तभी तुम अपनी ज़िन्दगी बेहतर अर्थ और दिशा दे पाओगे।
So do your duties lovingly, love everyone but remember......NO ADDICTION! A person who truly detaches, becomes a lion-hearted person, whose strength can never be deterred.
Hari Om!
इससे पहले कि मैं आदि शंकराचार्य कृत 'भज गोविन्दम' के 8वे श्लोका का उच्चारण व विश्लेषण करूँ, मैं यह कहना चाहती हूँ कि यह श्लोका detachment पर रौशनी डालता है। Detachment का मतलब है अपनी ज़िन्दगी से स्वार्थपरता और अपेक्षाओं को दूर करना| It is the removal of the feelings of selfishness, demands and expectations. To elaborate on this, I'll narrate a small excerpt from an article written by Sudha Murthy. मैं यह कथन उन्ही के perspective से कहूँगी।
"मैं सुधा मूर्ति हूँ और मेरे दो बच्चे हैं. मेरी बेटी बड़ी है और क्यूंकि वो मेरी पहली संतान है, मेरा जुड़ाव उससे कुछ अधिक था। एक बेटी और एक बेटे की माँ होने के नाते मैं जानती थी कि उनके अपने-अपने अस्तित्व का क्या महत्व था। इसलिए जब मेरी शादी के बाद मेरा घर छोड़ कर गयी, तो मुझे लगा मेरे तन से एक अंग काट गया है। मैं उसे काफी miss करने लगी। पर शादी के बाद जब वह पहली बार आई, तो मैं यह देख कर आश्चर्यचकित रह गयी कि उसकी प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं। अब जब वह अम्मा कहती, उसका मतलब उसकी mother-in-law होता, मैं नहीं। मेरे साथ कुछ समय बिताकर उसे भागने की जल्दी होती। तब मैंने यह निर्णय लिया कि यही वो समय है कि practice detachment with attachment. उसकी शादी के दो साल बाद मेरा बेटा उच्च अध्ययन के लिया अमरीका चला गया। चूँकि मैं एक बच्चे का पृथकरण अनुभव कर चुकी थी, मैं मानसिक रूप से ज्यादा सशक्त थी, ज्यादा मजबूत थी। उस समय मैंने अपने आप को various courses के लिए register किया। From Vedanta to Ike-bana, from healing to yoga, I learnt everything. And since my husband was a 24/7 workaholic, it was all the more necessary for my survival, my happiness and for maintaining peace. समय बीता और बेटा USA से पढ़कर आ गया और हमने उसकी शादी करदी। उसने अलग घर बसाने का निर्णय लिया और अब हम उसके इस निर्णय से काफी खुश थे। पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, हालात भी बदलते गये। USA में मेरे हाथ का खाना miss करने वाले मेरे बेटे के पास एक ही शहर में भी आने का समय नहीं था। उसकी भी प्राथमिकताएं बदल चुकी थी।
दोस्तों, हम इतना ज्ञान बांटते है पर बात जब अपने ऊपर और अपने बच्चों पर आती है, तो मन जैसे मानने को तैयार ही नहीं होता। पर अपनी ख़ुशी अपने हाथ में ही होती है। जब हम अपने रिश्तो या चीज़ो अत्यधिक मोह कर लेते है, असुरक्षा की अनुभूति काफी प्रबलता से होती है। तो मैंने समझा, प्यार सबसे करो पर मोह मत होने दो। Addiction दुःख देता है, प्यार शक्ति देता है। इसलिए तब मैंने तब मैंने अपनी एक नयी profile तैयार की। अब काम मैं सबके लिए पुरे तन-मन से करती, पर किसी से कोई अपेक्षा नहीं करती थी। I became detached in the sense that I did not expect anyone to reciprocate to my affection. Friends, if you let go of the ones you love, they will never go away. My children also started visiting me more often and I loved this. यही सुंदरता है detachment की। "
अब हम आते हैं अपने श्लोका पर-
का ते कान्ता कस्ते पुत्र
संसारो अयम तीव विचित्र
कस्य त्यम का कुत आयात
सत्तत्वं चिन्तय तदहि भ्राता
शंकराचार्य जी कहते हैं कि कौन तुम्हारा साथी है और कौन संतान? यह संसार बहुत विचित्र है। जब तक तुम्हारा देह है, यह सब रिश्ते हैं। तुम अकेले आये हो और अकेले ही जाओगे तो अपने कर्मों का पालन करो क्यूंकि केवल तुम्हारे कर्म ही तुम्हारे संग जायेंगे। कांता को हम विस्तार से बताएं तो इसका मतलब हमारा साथी है- वह हमारा जीवन-साथी हो सकता है, business partner हो सकता है या team mate भी हो सकता है। Partner is someone we look upto for comfort. Child is someone who looks upto us for support. यह सब क्यों हैं, हमने कभी इस पर चिंतन नहीं किया, पर अब समय है इस तथ्य पर रौशनी डालने का।
Shankracharya says we should maintain a dispossess attitude towards our possessions even while we have them and are enjoying them. लोग उनके इस तथ्य का गलत मतलब निकल लेते हैं और रिश्तों और वस्तुओं का त्याग कर देते हैं . NO.......Attachments need to go; not the objects of attachments. Problem is with our attitude, not with people or things. अगर हम सबको analyze करें तो हम देखेंगे कि जो भी हमारे साथ जुड़े हुए हैं- they are individuals with their own distinct personalities, life-goals and aspirations. We don't have much right to interfere with this pattern and impose our will on them. पर फिर भी हम करते हैं और खुद भी दुखी होतें है और सामने वाले को भी ठेस पहुंचाते हैं। दोष हम देते हैं परिस्थितियों को और कभी-कभी ईश्वर को भी। Accept them for what they are, not what you hope to receive from them. Then you see, how wonderful your life becomes.
Same lies with objects. चीज़ों का प्रयोग moderately करना है, उनके अधीन नहीं हो जाना है. तभी तुम अपनी ज़िन्दगी बेहतर अर्थ और दिशा दे पाओगे।
So do your duties lovingly, love everyone but remember......NO ADDICTION! A person who truly detaches, becomes a lion-hearted person, whose strength can never be deterred.
Hari Om!
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